दु:ख की छंटती बदलियां..
पीटूपी की मेहरबानी कि रहते-रहते फ़िल्मी नगीने हाथ लगते रहते हैं, और यह बात, शिद्दत से, भूलती नहीं कि हिंदी फ़िल्में क्यों और कैसे इतनी अझेल हैं. आज सुबह की अच्छी शुरुआत फ़िनिश निर्देशक आकि कॉउरिसमाकी की ‘ला विये दि बोहेम’ (1992) और ‘ड्रिफ्टिंग...
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Pramod Singh
संगीत
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[27 Sep 2008 01:57 AM]



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