सच का बाज़ार
सच का बाज़ार लगा लगा झूठ का दाम बिक गयी इंसानियत हो गया खून रिश्तों की लिहाज का ... हर रिश्ता खोजे अब सच्चाई अपने रिश्ते की नहीं रहा भरोसा खून का हर मांग में दिखने लगा अब धोखा ही धोखा आखिर बाज़ार ने फेंका ऐसा पांसा पैसे के आगे नंगा हुआ झूठ के लबादे में...
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विनय जायसवाल
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[20 Aug 2009 11:40 AM]



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