चलो किताब ही जलाएं
चलो चलें दुनिया को विकास समझाते हैं वापस लौटकर इतिहास का बाज़ार लगाते हैं बन गये हैं इन्सान इस पर सवाल उठाते हैं कोई हमें दिखाए सच का आइना उसे लात दो और चार लगाते हैं ... उठे अपने तरफ कोई उंगली तोड़ उंगली उसे ताकत का एहसास कराते हैं मिलते नहीं विचार तो...
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विनय जायसवाल
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[25 Aug 2009 23:55 PM]



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