एक गज़ल
अब ये रस्में-मोह्ब्ब्त भुला दीजिये उनके ख्वाबों को दिल से हटा दीजिये अश्क आँखों में देकर ये कहते हैं वो चाहतों को भी अपनी भुला दीजिये कल ही महफिल में रुसवा किया था हमें अब वो कहते है हमको वफ़ा दीजिये अपने ही जिस्म में अब न लगता है मन उनके दिल को कोई घ...
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सुनीता शानू
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[01 Dec 2008 10:21 AM]



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