धरती का गीत

मन पखेरू फ़िर उड़ चला धरती पर फ़ैली है,सरसों की धूप-सी धरती बन आई है, नवरंगी रूपसी ॥ फ़ूट पड़े मिट्टी से सपनों के रंग नाच उठी सरसों भी गेहूं के संग। मक्की के आटे में गूंथा विश्वास वासंती रंगत से दमक उठे अंग। धरती के बेटों की आन-बान भूप-सी धरती बन आई है,नवरंगी रूपसी॥ बाजरे की... [पूरी पोस्ट]
writer सुनीता शानू
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[01 Dec 2008 10:21 AM]

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