प्यार की पहली बारिश
एक मुद्दत से कुछ लिख नही पाई हूँ,आज एक प्रयास किया है,बस और कुछ नही... वो उतरी है जिस रोज आसमान से रिम-झिम सावन की फ़ुहार बनके झिलमिलाती रही ऎसे आँगन में मेरे असंख्य मोतियों का श्रृंगार बनके। छूती हूँ जब भी मै होठों से उसे महक उठती हूँ सोंधी बयार बनके...
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सुनीता शानू
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[12 Aug 2008 10:28 AM]



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