ग़ज़ल - नहीं है सांझ
नहीं है सांझ अपनी औ सवेरा । न आया रास मुझको शहर तेरा ॥ वहां पूरा मुहल्ला घर था अपना, यहां इक रूम का कोना है मेरा । वहाँ कस्बे में था आंगन लगा घर, यहाँ सूरज न ही है चांद मेरा । यहाँ बसते हैं लगता चील कौवे, हमेशा नोंचते हैं मांस मेरा । हुई है खत्म लगता...
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Kavi Kulwant
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[20 Nov 2008 04:27 AM]



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