पुकार
सहिष्णुता की वह धार बनो पाषाण हृदय पिघला दे । पावन गंगा बन धार बहो मन निर्मल उज्ज्वल कर दे । कर्मभूमि की वह आग बनो चट्टानों को वाष्प बना दे । धरती सा तुम धैर्य धरो शोणित दीनों को प्रश्रय दे । ऊर्जित अपार सूर्य सा दमको जग में जगमग ज्योति जला दे । पावक...
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Kavi Kulwant
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[17 Jul 2009 08:34 AM]



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