अगर मरते परिंदे को , बचाना जानते हैं हम ..गज़ल

मैं समय हूँ ... हमारा फ़न अभी तक भी पुराना जानते हैं हम जमाने , दोस्ती करके , निभाना जानते हैं हम किसी भूचाल से जिनमे दरारें पड नही पायें अभी तक इस तरह के घर बनाना जानते हैं हम उठा पर्वत उठाये जा , हमे क्या फ़र्क पडता है इशारो से पहाडों को , गिराना जानते हैं हम हमारी... [पूरी पोस्ट]
writer डा. उदय ’ मणि ’
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[22 Mar 2009 13:19 PM]

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