कहूं गर आज महफ़िल मे ...
कहूं गर आज महफ़िल मे , सहे कितने सितम दिल ने नहीं मुमकिन बयां इसकी , सही मैं दासतां कर दू हुआ नाकाम ही अक्सर , जहां की ठोकरें खाकर न अब ये वक्त पे हंसता , न गम के दौर मे रोता परेशां हूं मैं खुद इससे , करूं किससे गिला शिकवा न ये दुनिया मेरी सुनती , न अ...
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डा. उदय ’ मणि ’
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[09 Apr 2009 09:00 AM]



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