रुपिया-पैसा-जिन्दाबाद !
माइक से अटक-अटक कर चिल्लाता लोकतंत्र खींच रहा था लोगों को अपनी ओर और बदलता जा रहा था भीड़तंत्र में, बच्चों की किलकारियों के बीच तालियों का शोर दबता जा रहा था, जनता के मुंह से निकलता 'वाह-वाह' 'आह-आह' में प्रतिध्वनित हो रहा था, 'ब्रेक' के दौरान बंटती...
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मिथिलेश श्रीवास्तव
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[14 Jul 2009 01:40 AM]



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