पहली अंगड़ाई से लेकर आखिरी जम्हाई तक...
सुबह की पहली अंगड़ाई से लेकर रात की आखिरी जम्हाई तक सपने को हकीकत समझ हर आदमी सोता है एक कुंभकर्णी नींद, ढोल-नगाड़े बजते रहते हैं जिनकी जहरीली धुनों पर नाचता जाता है वो नींद में ही, मदारी के बंदर की तरह, खतरनाक बम धमाकों की आतिशबाजी और उसके बाद फैले...
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मिथिलेश श्रीवास्तव
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[08 Aug 2009 10:36 AM]



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