ख़बरी की एक गज़ल

सरपंच हुनर भी सब चुक गया है, मुस्कुराने का अब जमाना लद गया है- दिल लगाने का छांव, बारिश, नीम, नदिया- सब पुरानी हो गयी जबसे चलन चला है- मेहमानखाने का फोन वाले प्यार की तासीर कम होती रही कब से वाकया नहीं हुआ- सपनों में आने का होली, दीवाली, ईद- सब दरिया में ज... [पूरी पोस्ट]
writer देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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[14 Jun 2009 16:32 PM]

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