कुदरत के नजारे - Ghazal
मेरा यह नेचुर के ऊपर एक ग़ज़ल लिखने का पहला प्रयासः है। उम्मीद करता हूँ आप को पसंद आएगी... आज सुबह जब मेरा बाग़-ऐ-गुल से गुजर हुआ। कुदरत के करिश्मे का दिल पे अज़ब असर हुआ। हलकी फ़ैली थी धूप जैसे सफेद चादर का हो रूप, ठंडी हवा चल रही थी जिस से बदन शरर शरर...
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आशु
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[12 Dec 2008 21:01 PM]



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