नक्सलवाद और महाराज प्रबीर चंद भंजदेव की हत्या: थोडा आज, कुछ इतिहास (“बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ” आलेख श्रंखला)
आई प्रबीर-द आदिवासी गॉड ” देर रात तक इस पुस्तक पर आँखें गडाये रहा, कब नींद आ गयी पता ही नहीं लगा। सीने पर पडी किताब से एक सपना आँखों के भीतर चू गया। मेरे सम्मुख देवताओं की तरह दिखने वाला व्यक्तित्व खडा था - चौडा ललाट, बोलती हुई आँखें और कंधे तक बिखरे...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[14 Jul 2008 01:17 AM]



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