कैसे मेरा दिल धडकने लगा है...
मेरे बगीचे के गुलाब मुस्कुराते नहीं थे हवा मुझे छू कर गुनगुनाती नहीं थी परिंदों नें मुझको चिढाया नहीं था मेरे साथ मेरा ही साया नहीं था तुम्हे पा लिया, ज़िन्दगी मिल गयी है चरागों को भी रोशनी मिल गयी है नदी मुझसे मिलती है इठला के एसे कि जैसे शरारत का उस...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[17 Jul 2008 05:03 AM]



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