आ कर कहीं से तुम तभी...
आप तो जाते रहे फिर नींद भी जाती रही आसमां की चांदनी हमको जलाती भी रही वो एक ख्वाब जो आँखें खुले देखा किये हम रात भर जलती रही अपनी चिता जैसे जला करते अभी जब बुझ गये बस राख थे आ कर कहीं से तुम तभी ले चुटकियों में राख माथे पर सजा ली फिर जी गये हम पलक झप...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[05 Aug 2008 01:36 AM]



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