टुकडॆ अस्तित्व के..

सफर - राजीव रंजन प्रसाद मन का अपक्षय आहिस्ता आहिस्ता मुझको अनगिनत करता जाता है नदी मेरे अस्तित्व से नाखुश है और मुझे महज इतना ही अचरज है इतना तप्त मैं टूटता हूं पुनः पुनः मोम नहीं होता लेकिन.. निर्निमेष आत्मविष्लेषण एकाकी पन एकाकी मन और तम गहन..गहनतम अपने ही आत्म में हाथ पा... [पूरी पोस्ट]
writer राजीव रंजन प्रसाद
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[07 Aug 2008 01:11 AM]

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