सचमुच तरक्की भी क्या चीज है..
सभ्यता व्यंग्य से मुस्कुराती है जंगल के आदिम जब "मांदर" की थाप पर लय में थिरकते हैं जूड़े में जंगल की बेला महकती है हँसते हैं, गुच्छे में चिडिया चहकती है देवी है, देवा है पंडा है, ओझा है रोग है, शोक है, मौत है.. भूख है, अकाल है, मौत है.. फिर भी यह उप...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[10 Aug 2008 04:02 AM]



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