मेरे साये..

सफर - राजीव रंजन प्रसाद जैसे ही आईना देखा , चौंक गया , मेरा चेहरा कहीं नहीं था , कहीं नहीं.. सिर धुनता दीवारों पर मैं चीख उठा खंडहर पर बैठे चमगादड़ उड़ कर भागे डर कर मकड़ी धागे पर कुछ और चढ़ी आँखें मिच-मिच करते उल्लू अलसाये खिल-खिल कर के हँसी गहनतम खामोशी कितने फैल गये देखो... [पूरी पोस्ट]
writer राजीव रंजन प्रसाद
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[13 Aug 2008 04:06 AM]

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