जैसे कोई मर्तबान में, जल-चीनी का घोल बना दे..
जैसे इकलौता गुल खिल कर, काँटों को बेमोल बना दे सीपी क्या है एक खोल है, मोती हो अनमोल बना दे.. तुम होते हो खो जाता हूं, फिर अपनी पहचान साथ है जैसे कोई मर्तबान में, जल-चीनी का घोल बना दे.. मन के भीतर की आवाज़ें, आँखों से सुन लेता हूँ, साथ हमारा एसा जो,...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[17 Aug 2008 04:25 AM]



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