युगों तक खमोश दो बुत..
नारज़गी हद से बढी और हो गयी पर्बत आँखों से पिघल गया ग्लेशियर जैसे मोम नदी हो जाता है पत्थर की तरह पिघल पिघल कर.. पीठ से पीठ किये युगों तक खमोश दो बुत इस तरह बैठै रहे तोड तोड कर चबाते हुए घास के तिनके जैसे गरमी की दोपहर ढलती नहीं.. और जब नदी न रही पिघल...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[19 Aug 2008 00:55 AM]



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