पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ...
मुझको बरसात में सुर मिले री सखी पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ , कुछ कहूँ .. एक कूँवे में दुनियाँ थी, दुनियाँ में मैं गोल है, कितना गहरा पता था मुझे हाय री बाल्टी, मैने डुबकी जो ली फिर धरातल में उझला गया था मुझे मेरी दुनिया लुटी, ये कहाँ आ गया छुपता फिरता...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[27 Aug 2008 00:30 AM]



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