मैं भी जीवित हूं....

संवेदना मार्च 09 मैं आया था तुम्हारे घर, तुम तो कहती थी... मेरे द्वार खुले हैं, हर पल तुम्हारे लिए... पर वहां एक ताला था, मैं सीढ़ियों पर बैठा... कर रहा था...तुम्हारा इंतजार, एक घण्टा...दो घण्टा...विवश... अंतत: मैनें खिड़की से झांका, नजर आया... एक सूखा गुलाब... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कुमार वर्मा
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[30 Mar 2009 09:26 AM]

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