उदयपुर में आयोजित एक महत्वपूर्ण साहित्यिक गोष्ठी की रपट

Jog Likhee उदयपुर। पारम्परिकता रेत के शिल्प को शिथिल नहीं कर सकी और जरायमपेशा समाज पर लिखे जाने के बावजूद यह अतिरंजना से बचता है। सुपरिचित आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक डॉ. माधव हाड़ा ने भगवानदास मोरवाल के चर्चित उपन्यास रेत के संबंध में कहा कि समाजशास्त्रीयता इस उ... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
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[29 Jan 2009 01:29 AM]

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