नज़र में सभी की खु़दा कर चले - पहली किश्त
ग़ज़ल कह के हम हजरते मीर को ख़िराज—ए—अक़ीदत अदा कर चले इस तरही का आगाज़ हम स्व: साग़र साहब की ग़ज़ल से कर रहे हैं। हाज़िर हैं पहली तीन ग़ज़लें- मनोहर शर्मा’साग़र’ पालमपुरी इरादे थे क्या और क्या कर चले कि खुद को ही खुद से जुदा कर चले अदा यूँ वो रस्म—ए—वफ...
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सतपाल
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[04 Sep 2009 04:04 AM]



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