गाठें ही गाठें.

संचिका वो एक उलझे सूत का गोला था रंग-बिरंगे धागे थे ढेर सारी गांठे थी उससे कैसे गलीचा बनता? एक सुलझाती तो दूजा उलझता एक खींचती तो दूजा सिमटता धीरे से खींचो तो अटक जाता जोर लगाने पर टूट जाता उससे कैसे गलीचा बनता? मुद्दतें बीती सुलझाते हुए अंत तक लेकिन फ़िर भी... [पूरी पोस्ट]
writer लवली कुमारी / Lovely kumari
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[10 Oct 2008 05:36 AM]

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