लौटना मार्क्‍स का (Lautna Marx Ka)

DHAI AKHAR ढाई आखर इधर एक शोर बरपा है। दाढ़ी खुजलाते, बाल झटकते, बोलते-बोलते टेढ़े होते बदन, हमेशा तनाव से खींचे रहने वाले चेहरों पर चमक दिख रही है। कार्ल मार्क्‍स लौट रहे हैं। दास कैपिटल यानी पूँजी की तलाश फिर शुरू हुई है। गोष्ठियों में कहा जा रहा है, ‘देख... [पूरी पोस्ट]
writer Nasiruddin
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[22 Nov 2008 00:34 AM]

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