ग़ज़ल - मेरे भीतर हुनर मेरा कुछ ऐसे छ्ट्पटाता है

kavideepakgupta मेरे भीतर हुनर मेरा कुछ ऐसे छ्ट्पटाता है कफस में कैद पंछी ज्यों परों को फडफडाता है किसी को आइना दिखलांऊ तो दिखलांऊ मैं कैसे मेरा किरदार ही जब मुझपे खुद उंगली उठाता है न जाने क्या गुनह मुझसे हुए तारीक रातों में उजालों में मेरा साया तलक मुझको डरता है ग... [पूरी पोस्ट]
writer kavideepakgupta
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[09 Aug 2009 06:38 AM]

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