बदली
मद्धम स्लेटी, कितने सारे बादल छाये हैं। अद्भुत मेरे सतरंगी सपने सब एक रंग में ही आए हैं! मद्धम स्लेटी से उन बादलों में, खोजता हूँ तुम्हारा चेहरा। वो शायद नाक है वहाँ और वो शायद आँखें जहाँ रंग है गहरा।। तस्वीर तुम्हारी ये हर पल बनती है, बिगड़ती है सुध...
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[12 Aug 2009 02:18 AM]



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