ग्लोबल वार्मिंग

शब्‍दार्थ अब बारिश में मेढक नहीं टरटराते। रातों में जुगनू नहीं जगमगाते. आसमान भी अब स्लेटी सा है, तारे भी नहीं दिखते अब टिमटिमाते॥ अब पानी पड़ने पर मिटटी नहीं महकती। अब बालकनी में सुबह गौरैया नहीं चहकती। अब सर्दी बस सर्दियों की छुट्टियों जितनी होती है। और गर्मी... [पूरी पोस्ट]
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[26 Aug 2009 23:48 PM]

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