क्यूँ तुम मंद-मंद हसती हों

vikram7 क्यूँ तुम मंद-मंद हसती हों मधु-बन की हों चंचल हिरणी बन बैठी मेरी चित- हरणी कर तुम ये मृदु-हास , मेरे जीवन में कितने रंग भरती हों क्यू तुम मंद-मंद ह्सती हों तुम हों मैं हूँ स्थल निर्जन बहक न जाये ये तापस मन अपने नयनो की मदिरा से, सुध बुध क्यू मेरे हरत... [पूरी पोस्ट]
writer vikram7
views
8
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[20 Aug 2009 14:57 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix