ओ जयन्‍त

कुमार आशीष धमाकों में सिकुड़ जाता है मन थोड़ा सा ...ज्‍यादा फैलता है ओ जयन्‍त, याद है कुछ... चक्षु-विक्षत चरण सीता के तुम्‍हारे दृगों को फिर संतुलित होने न देंगे.. कहां भागोगे किधर जाओगे आखिर भागकर तुम सींक जब बन जायेगी शर राम का, तब कौन देगा आश्रय फिर ओ जयन्‍त... [पूरी पोस्ट]
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[24 Nov 2007 05:47 AM]

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