कुतूहल

कुमार आशीष द्रुत गति से बहती सरिता की कलकल है या विस्‍मय के होठों पर ठहरा पल है काश, कभी आगे भी इसके जान सकूं अभी तो नारी मेरे लिए कुतूहल है... [पूरी पोस्ट]
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[09 Mar 2008 08:55 AM]

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