मुसाफिर
हमीं नहीं हैं मुसाफिर... हैं चांद सूरज भी दरअसल, पार हमें जुस्तजू को करना है... हमारे जेहन में पलती है जुगनुओं की तरह उसी की कौंध में अब हमको वजू करना है...
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[13 Mar 2008 01:08 AM]



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