इक नन्हा यकीं
वो हर जर्रे में है मौजूद ये होली बताती है.. बताती है कि इक नन्हा यकीं क्या गुल खिलाता है.. ..बगावत है जरूरी आड़े वालिद ही न खुद क्यूं हो है वाजिब जंग जब हैवान कोई जुल्म ढ़ाता है ..अजब फितरत है मगरूरी कि इसकी जज्ब में आकर अकड़कर खाक का पुतला खुदी...
[पूरी पोस्ट]
8
0
0
0
0
[21 Mar 2008 03:02 AM]



Shuffle








