बीता है जो
जो बोले है मुझमें से 'मैं' वह मुझमें या कहीं और है जीवन का आखिर सच क्या है 'होना' खुद में किस बतौर है खुली हुई पलकों का सच ही सच-नगरी का महापौर है जीवन लुभा रहा है खुद को लिए हाथ में एक कौर है यह तो हर्जाना है दिल का बीता है जो, तुम्हें गौर है?...
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[02 May 2008 09:21 AM]



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