मां की वह कोख

कुमार आशीष जो आजाद होकर के होना था ऐसा तो उससे हमारी गुलामी भली थी नजर तो चुराना न था एक दूजे से नफरत तो दिल में न ऐसी पली थी कभी भाई हमने ये सोचा नहीं था कि कि अब अस्‍पतालों में होंगे धमाके जो जांबाजी का सिर्फ यह नमूना तो फिर मां की वह कोख खाली भली थी जो आजाद... [पूरी पोस्ट]
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[22 Sep 2008 07:53 AM]

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