GAZAL
मुल्ला काम में अपने मगन थे, पंडित अपनी धुन में धीरे-धीरे आजादी का रस आया जामून में तलवारों की धारें-सी चमकीं एक-एक नाखून में रुत बदली तो ऐसी बदली जेठ लगा फागुन में तपते जेठ ने बात सुनाई आकर भीगे सावन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की...
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डा. फीरोज़ अहमद
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[05 Mar 2009 02:46 AM]



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