GAZAL
इस मजमें में एक तरफ से ख्वाजा हसन भी आये अपने खेमे में बैठे चारों पर्दे सरकाये रात गये तक लोग आते थे अपने पैर दबाये आजादी के दीवानों ने अपने पैर जमाये ऐ दोरी! क्या याद नहीं आती अब तुझको उस सन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुना सत्तावन की...
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डा. फीरोज़ अहमद
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[20 Mar 2009 15:36 PM]



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