मेरी तरह उदास जला सा लगा है चांद

भूख नूर मुहम्मद नूर की एक ग़ज़ल मेरी तरह उदास, जला सा लगा है चांद फिर आज कितना ख़ूब भला सा लगा है चांद। दिखता है दाग़दार, जले के निशान हैं दलितों की झोपड़ी सा, जला सा लगा है चांद हम तो तमाम उम्र किसी के न हो सके जूड़े में आसमां के खिला सा लगा है चांद इक... [पूरी पोस्ट]
writer Satyendra Prasad Srivastava
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[16 Sep 2008 08:06 AM]

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