मैं जीभ बना रहा हूं
गोपाल प्रसाद की कविता आत्मा की आवाज़ मैं सब काम छोड़ कर जीभ बना रहा हूं ताकि करोड़ों लोग जो बे-जुबान हैं बोल सकें। अगर मेरा यह काम अपराध है तो यह अपराध मैं बार-बार करूंगा तुम जो भी सज़ा दोगे अंगीकार कर लूंगा किंतु मेरी अन्तर-आत्मा कहती है मेरा यह काम...
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Satyendra Prasad Srivastava
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[18 Sep 2008 08:26 AM]



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