जब जेब कट जाती है

भूख धोखा शैलेंद्र की एक कविता यह जो चमक-दमक है जिससे आंखें जुड़ाती हैं हकीकत से कहीं दूर ले जाती हैं भटकाती हैं अफसोस! समझ में ये बात तब आती है जब जेब कट जाती है। क्या आपने कथा संसार में समीर लाल की कहानी 'आखिर बेटा हूं तेरा' पढ़ी? अगर नहीं तो क्लिक आखिर... [पूरी पोस्ट]
writer Satyendra Prasad Srivastava

शैलेंद्र का पन्ना

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[27 Sep 2008 00:56 AM]

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