कसूर

भूख शैलेंद्र की एक कविता उनका कोई कसूर नहीं था उन्हें कुछ भी नहीं हथियाना था कब्जियाना था फिर भी फिर भी जंगल में आग लगी और जल गए आशियाने उनके भी अपनी दुनिया में ही खोए रहने की आदती थी उनकी और उनकी हर जगह खलल डालने की। अपने ही देश में से साभार... [पूरी पोस्ट]
writer Satyendra Prasad Srivastava

शैलेंद्र का पन्ना

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[16 Aug 2009 05:37 AM]

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