हम लोग
हम वृत्त की परिधि पे खड़े हुए लोग हैं और हमारा जीवन - केन्द्र तक पहुँचे जा सकने की अलसाई, मुरझाई जद्दोजहद। फीके अभिमान और बासी अवचेतन के साथ जीते - हम, अपनी लिप्साओं की विकल विवशता और अनुरोधों के मृदु अवरोधों के बीच परिधि से परिधि तक की दूरी तय किए जा...
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विकास कुमार
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[05 Aug 2009 06:20 AM]



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