स्वयं को पाओ!
आविष्कार! आविष्कार! आविष्कार! कितने आविष्कार रोज हो रहे हैं! लेकिन जीवन संताप से संताप बनता जाता है। नरक को समझने के लिए अब किन्हीं कल्पनाओं की आवश्यकता नहीं। इस जगत को बतला कर कह देना ही काफी है : 'नरक ऐसा होता है।' और इसके पीछे कारण क्या है? कारण ह...
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राजेंद्र त्यागी
पथ के प्रदीपधर्म-अध्यत्म
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[08 Sep 2008 19:30 PM]



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