दिल को संभलने नहीं देते...!
ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल तुम हो हमें करवट भी बदलने नहीं देते परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले क्यों हमको जलाते हो कि जलने नहीं देते हैरान हूँ किस तरह करुँ...
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Dr. Chandra Kumar Jain
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[31 Jul 2009 10:50 AM]



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