आशिक का जनाज़ा उर्फ़ महबूबा की राहत

सस्ता शेर द जनाज़ा ऑफ़ महबूब निकला फ्रॉम द गली ऑफ़ महबूबा विथ लोट्स ऑफ़ जोर शोर सुनकर महबूबा झांकी फ्रॉम द डोर एंड बोली- 'आखिर मर ही गया हरामखोर'.... [पूरी पोस्ट]
writer विजयशंकर चतुर्वेदी

हमने चढ़ाया है

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[15 Jun 2009 08:09 AM]

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