जिन्दगी
इस तरह शर्तों पे कैसे, कब तक कटेगी जिन्दगी ! गिर के यूँ कब तक , संभलती रहेगी जिन्दगी ! अपने अपने गरूर की, सीमा पे खड़े हुए हैं हम , बीच मैं गहरी है खाई , गिर कर रहेगी जिन्दगी तनहाइयों के शोर में सिमटे हुए हर शख्स को , यूँ ठहाकों के कफ़न से ,कब तक ढकेग...
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sanjeev kuralia
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[28 Dec 2009 22:39 PM]



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