इस एहसास को कोई नाम न दो...

अर्ज़ है... इस प्यार को कोई नाम न दो.. इस एहसास को कोई नाम न दो.. इस जज़्बात को कोई नाम न दो... मगर ये कैसे मुमकिन है... जब एक ज़िंदगी दूसरी ज़िंदगी से मुकम्मल तरीके से जुड़ी हो... आंखो में लाखों सपने हों... दिल में हज़ारों अरमान हों... हज़ार ख्वाहिशें हों... फि... [पूरी पोस्ट]
writer अबयज़ ख़ान
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[28 Dec 2009 22:30 PM]

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